CG GK छत्तीसगढ़ का इतिहास | History of Chhattisgarh | छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश का इतिहास | KALCHURI VANSH

 छत्तीसगढ़ का इतिहास | CHHATTISGARH GK 

CG HISTORY KALCHURI KAAL


छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास 

  • अब हम छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास को समझने का प्रयास करेंगे। छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास देख चुके है अगर आप लोग नहीं पढ़ें हुए है तो इतिहास वाले खंड में जाकर देख सकते है।  

  • छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास में सबसे पहले हम छत्तीसगढ़ में कलचुरी राजवंश से सम्बंधित तथ्यों को समझने का प्रयास करेंगे।  अगर आप लोग को कुछ भी सुझाव देना होगा तो कमेंट करके दे सकते है।  

कलचुरी राजवंश 

  • छत्तीसगढ़ में कलचुरी राजवंश को जानने से पहले एक नजर भारत के इतिहास में डालते है।  भारत के इतिहास में कलचुरी  राजवंश का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत में कलचुरी राजवंश  1200 वर्षों तक किसी न किसी क्षेत्र में शासन किया है। अगर वर्ष देखें तो 550 ई. से लगभग 1740 ई. तक इन्होने शासन किया। जो किसी राजवंश का इतने लम्बे समय तक शासन करना उनके लिए गौरव की बात है। 
  • विद्वानों ने कलचुरी और हैहयवंशी को एक ही माना है और चन्द्रवंशीय क्षत्रिय माना है। कालंजर, प्रयाग, त्रिपुरी , काशी , तुम्माण, रतनपुर, खल्लारी , रायपुर में कलचुरियों ने अपनी राजधानी की. 

  • कलचुरी राजवंश का मूलपुरुष  कृष्णराज था। जिसने इस वंश की स्थापना की।  कृष्णराज का पुत्र शंकरगढ़ प्रथम उसका पुत्र बुद्धराज था इसके बाद लगभग कुछ वर्षों तक इनकी जानकारी नहीं मिलती है। 

  • 9 वीं शताब्दी में कलचुरियों का विस्तार हुआ।  वामराजदेव को त्रिपुरी कलचुरी का संस्थापक कहा गया। कोकलदेव के 18 पुत्र थे  सबसे बड़ा पुत्र शंकरगढ़ द्वितीय " मुग्धतुंग" था। जो 900 ई. में त्रिपुरी में गद्दी पर बैठा और साम्राज्य विस्तार के लिए अपने आस पास के क्षेत्रों पर आक्रमण करना आरम्भ कर दिया। इसी क्रम में कोसल क्षेत्र में बाण वंश का शासन था इन्हे पराजित करके यहां भी कब्जा कर लिया। 

छत्तीसगढ़  में कलचुरी राजवंश का इतिहास -

  • दक्षिण कोसल के इतिहास अर्थात छत्तीसगढ़ के इतिहास में भी कलचुरी वंश की अहम् भूमिका थी। इन्होने 1000 ई. से 1740 ई. तक शासन किया। कलचुरी राजवंश छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक समय तक शासन करने वाला वंश है। 
  • कलचुरी वंश की स्थापना - कलचुरी वंश की स्थापना सन 1000 ई. में कलिंगराज ने की थी।  कलचुरी वंश के अंतिम शासक रघुनाथ सिंह था।  कलचुरियों ने छत्तीसगढ़ में अपनी प्रथम राजधानी तुम्माण को बनाया।  मराठाओं के अधीनं शासन करने वाले प्रथम शासक रघुनाथ सिंह और अंतिम स्वतंत्र कलचुरी शासक यही था, मराठाओं के अधीन शासन करने वाला अंतिम शासक मोहनसिंह था।  कलचुरी वंश के शासक की कुलदेवी ' गजलक्ष्मी ' थी।  कलचुरी काल के प्रसिद्द कवि गोपाल मिश्र था। 

रतनपुर कलचुरी शाखा के प्रमुख शासक -

कलिंगराज - 

  • छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश का वास्तविक संस्थापक कलिंगराज था। कलिंगराज ने 1000 ई. से 1020 ई. तक शासन किया। कलिंगराज ने अपनी राजधानी तुम्माण को बनाया और चैतुरगढ़ /तुम्माण में महिषासुर मर्दिनी मंदिर का निर्माण कराया। 

कमलराज -

कलिंगराज का पुत्र कमलराज लगभग 1020 ई. में तुम्माण में शासन किया।  कमलराज का शासनकाल 1020 ई. से 1045 ई. तक रहा।  इन्होने त्रिपुरी शाखा के शासक गांगेयदेव की ओडिसा अभियान में सहायता प्रदान किया था।  

रत्नदेव प्रथम - 

  • रत्नदेव प्रथम सन 1045 ई. में राजगद्दी पर बैठता है और 1065 ई. तक शासन करता है इसी तरह इसका शासन काल 1045 ई. से 1065 ई. तक रहा , इसी बिच इन्होने कई महत्वपूर्ण कार्य किये। 

  • रत्नदेव ने राजधानी परिवर्तन किया।  रत्नदेव ने सन 1050 ई. में रतनपुर नगर की स्थापना किया और उसे अपनी राजधानी बनाया अर्थात तुम्माण से रतनपुर राजधानी परिवर्तन किया। तुम्माण में शासन करने वाला यह अंतिम शासक था।  तुम्माण से तीन राजाओं ने सत्ता संभाली - कलिंगराज , कमलराज और रत्नदेव प्रथम। 
  • कलिंगराज की पत्नी का नाम नोनल्ला देवी था।  

रत्नदेव प्रथम ने निम्न निर्माण कार्य किये -

  • रतनपुर में महामाया मंदिर का ११ वीं शताब्दी में निर्माण कराया। 
  • लाफागढ़ में महिषासुर मर्दिनी का निर्माण करवाया। 
  • तुम्माण में रत्नेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया और तुम्माण में ही  शिव मंदिर बनवाया जिसका नाम वंकेश्वर शिव मंदिर है। 
  • रत्नदेव के शासनकाल में रतनपुर को कुबेरपुर के नाम से भी जाना जाता था। 

साम्राज्य विस्तार -

  • रत्नदेव ने 1055 ई. में सोमवंशीय शासक उद्योगकेशरी अर्थात महाभवगुप्त चतुर्थ को पराजित कर सिरपुर क्षेत्र को कलचुरी साम्राज्य में शामिल कर लिया। 
  • कोसोमंडल की वजुवर्मन की कन्या नोनल्ला देवी से विवाह किया , वज्जुक का कोई उत्तराधिकारी नहीं था इसलिए पेंड्रा क्षेत्र भी रत्नदेव का हुआ। 


 पृथ्वीदेव प्रथम -

  • रत्नदेव के पश्चात् उसका पुत्र पृथ्वीदेव प्रथम ने सत्ता का संचालन किया।  इन्होने 1065 ई. से 1095 ई. तक शासन किया। इन्होने अनेक उपाधियाँ अपने नाम किया। ये अमोदाताम्रपत्र के अनुसार  21000 गांव के  स्वामी थे इसी तरह अपना साम्राज्य विस्तार करके सकलकोसलाधिपति की उपाधि धारण की और साथ ही प्रचंड कोसलाधिपति , महामडलेश्वर और समागधीपत शेषपंच की भी उपाधि धारण की। 
  • इन्होने अपनी राजधानी रतनपुर को ही रखी। 
  • पृथ्वीदेव प्रथम ने अनेक निर्माण कार्य करवाए -
  • रतनपुर में विशाल तालाब का निर्माण करवाया। 
  • चित्तौड़गढ़ ( लाफागढ़) का किला बनवाया गया। जिसमें तीन प्रवेश द्वार है - मेनका दरवाजा, सिंह दरवाजा और हुंकारा दरवाजा। 
  • तुम्माण में पृथ्वीदेवेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।  
  • पृथ्वीदेव प्रथम की पत्नी का नाम राज्ल्ला था जो उनके मंत्रियों के अभिलेख से मिलता है - विग्रहराज और सोढ़देव। 

जाजल्यदेव प्रथम - 

  • जाजल्यादेव प्रथम पृथ्वीदेव का पुत्र था इन्होने लगभग 1095 ई. में रतनपुर की गद्दी पर बैठा और 1120 ई. तक शासन किया अर्थात जाजल्यदेव प्रथम का शासनकाल 1095 ई. से 1120 ई. तक था।  
  • इन्होने गजशार्दूल की उपाधि धारण किया था।  
  • जाजल्यदेव  त्रिपुरियों की अधीनता अस्वीकार कर दिया और छत्तीसगढ़ में स्वर्ण सिक्के चलवाये जिसमे श्रीमज्ज जाजल्यदेव व् गजशार्दूल चित्रित करवाया।  
  • ताम्बा की सिक्के चलवाये जिनकी आकृतियां चन्देलों के सिक्कों के समान हनुमान आकृति के थे। 
  • जाजल्देव ने अपने नाम पर जाजल्यपुर नामक नगर बसाया जो वर्तमान में जांजगीर के नाम से जाना जाता है।  यहां इनकी स्मृति में प्रतिवर्ष जाजल्य महोत्सव मनाया जाता है। 
  • जाजल्यपुर अर्थात जांजगीर में भगवान् विष्णु का मंदिर बनवाया जो नकटा मंदिर के नाम से जाना जाता है। 
  • जाजलदेव ने पाली के शिव मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया जिसे बाणवंशीय शासक विक्रमादित्य ने बनवाया था।  
  • पाली  शिव मंदिर के द्वार पर " श्रीमज्ज जाजल्य देवस्याकीर्ति " उत्कीर्ण करवाया। 
  • जाजलदेव प्रथम ने छिन्दक नागवंशी शासक सोमेश्वरदेव को पराजित किया और उनके पुरे परिवार को बंदी बना लिया लेकिन सोमेश्वर देव की माता गुण्डमहादेवी की आग्रह करने पर उसे स्वतंत्र कर दिया। 
  • रतनपुर शिलालेख में इनकी विजयी का वर्णन मिलता है , इनके द्वारा जीते हुए क्षेत्र - खीमडी , लाजिक ( लांजी), बैरागढ़, भणार, तल्हारी, दंडकपुर, नंदवली  कुक्कुट है। 
  • जाजल्यदेव प्रथम कलचुरी वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। मल्हार पर सर्वप्रथम कलचुरी वंश का अधिपत्य।  

रत्नदेव द्वितीय -

  • रत्नदेव द्वितीय ने लगभग 1120 ई. में राज्य संभाला और 1135 ई. तक शासन किया।  इसने अपने पिता जाजल्यदेव प्रथम में त्रिपुरी की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया और त्रिपुरी नरेश गयाकर्ण के आक्रमण को विफल कर दिया।  
  • रत्नदेव द्वितीय ने ओडिसा के शासक अनंत वर्मा चोड़गंग को शिवरीनारायण के समीप पराजित किया था।  
  • इन दोनों आक्रमण के बाद इनका साहस बढ़ गया और इन्होने अपने साम्राज्य की विस्तार के लिए उनके युद्ध लड़ें - बंगाल के गोंड राजाओं को पराजित किया और भंज राजाओं की राजधानी खिजजिंग पर आक्रमण किया और वहां के राजा हरवोहू को पराजित किया। 
  • रत्नदेव द्वितीय के कॉल के अभिलेख - अकलतरा, शिवरीनारायण, पारागांव और सरखों से प्राप्त हुआ है।  
  • रत्नदेव द्वितीय के स्थापत्य - इनके सामंत वल्ल्भराज द्वारा विकर्ण महल ( कोटगढ़ ) व् रेवंत मंदिर का निर्माण। 
  • इन्हे 36 विधाओं का ज्ञाता कहा जाता है।  

पृथ्वीदेव द्वितीय - 

  • रत्नदेव द्वितीय के बाद पृथ्वीदेव द्वितीय उनका पूत्र उत्तराधिकारी हुआ।  इनका शासनकाल 1135 ई. से 1165 ई. तक था।  इसके काल में रतनपुर का कलचुरी साम्राज्य का विस्तार अधिक हुआ।  
  • इनके जानकारी राजिम शिलालेख से मिलती है।  पृथ्वीदेव द्वितीय के काल में सर्वाधिक अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनकी संख्या 13 है। 
  • इन्होने स्वर्ण और ताम्बे के सिक्के चलवाये।  
  • पृथ्वीदेव द्वितीय के सेनापति जगत पाल ने राजिम के राजीवलोचन मंदिर का जीर्णोद्वार कराया।  राजिव लोचन मंदिर का निर्माण नलवंशीय शासक विलासतुंग ने कराया था।  
  • इन्होने साम्राज्य विस्तार के लिए युद्ध किये और विजित भी  हुए - अपने सामंत ब्रम्हदेव के साथ मिलकर कलिंग के शासक जटेश्वर को पराजित किया।  जटेश्वर अनत वर्मा का पुत्र था। 
  • चक्रकोट अर्थात चित्रकूट , बस्तर के गंग राजाओं को पराजित किया। कलचुरी के साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार इन्ही के शासन काल में हुआ। 

पृथ्वीदेव शासनकाल के निर्माण कार्य - 

  • पृथ्वीदेव द्वितीय ने रतनपुर का किला का निर्माण करवाया जो गज किला  नाम से जाना जाता है। गजकिला में रावण की ऐसी प्रतिमा है जिसमे रावण स्वयं की सिर काट रहा है। 
  • इन्ही के शासनकाल में रतनपुर के खडग तालाब का निर्माण कराया गया था। 
  • इनके सामंत वल्लभराज ने खारंग झील का निर्माण करवाया और सामंत ब्रम्हदेव ने सम्बलपुर में नरसिंह नाथ मंदिर एवं नारायणपुर बलोदाबाजार) में धुर्जरी मंदिर और डुमर महल बनवाया। 

जाजल्यदेव द्वितीय -

  • पृथ्वीदेव द्वितीय के बाद जाजल्यदेव द्वितीय ने शासन किया। इन्होने 1166 ई. से 1168 ई. तक शासन किया।  
  • इन्होने ज्यादा दिन शासन नहीं किया। 
  • इनके शासनकाल में चंद्रचूर्ण मंदिर का निर्माण हुआ जो जांजगीर चाम्पा के शिवरीनारायण में है। 
  • इनके शासनकाल में  सोमराज नामक ब्राम्हण ने मल्हार में केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कराया था। 
  • इसके शासनकाल में त्रिपुरी  शासक जयसिंह ने रतनपुर पर आक्रमण किया जो असफल रहा , यह युद्ध शिवरीनारायण के समीप हुआ था , जिसमे अल्हड देव ने सहायता की और वीरगति को प्राप्त हो गए।  

जगतदेव

  • जगतदेव ने जाजल्यदेव की मृत्यु के बाद सत्ता की बागडोर सम्भाली ।
  • जाजल्यदेव के मृत्यु के बाद राज्य में अव्यवस्था फैली हुई थी वो सब को समाप्त किया और रतनपुर में पुनः शांति का माहौल लाया।
  • जगतदेव का शासनकाल 1168 से 1178 ई. तक था।

रत्नदेव तृतीय -

  • जगतदेव के बाद रत्नदेव ने शासन किया इनका शासनकाल 1178 से 1198 ई. तक रहा।
  • इनके शासनकाल में भयंकर अकाल पड़ा था।
  • इन्होंने रतनपुर में लखनीदेवी ( एकविरादेवी) मंदिर का निर्माण कराया।
  • रतनपुर में पुराराती ( शिव ) मंदिर का निर्माण कराया।
  • इन्होने खरौद के लक्ष्मण मंदिर का जीर्णोद्धार अपने सेनापति गंगाधर राव के द्वारा करवाया। 

प्रतापमल -

  • रत्न देव तृतीय के बाद रतनपुर के सत्ता की बागडोर प्रतापमल ने संभाला । 
  • प्रतापमल का शासनकाल 1198 ईस्वी से ईस्वी से 1222 ईस्वी तक रहा ।
  • प्रतापमल ने तांबे के गोल चक्र आकार एवं षडकोणीय सिक्के जारी किए जिन पर सिंह तथा कटार की आकृति खंचित किये है।ताम्रपत्र - पेडराबन्ध (1218 ई), बिलाईगढ़ ( 1222 ई.)

 

अंधकार युग -

  • प्रतापमल के बाद लगभग 200 वर्षो तक शासन की कोई स्पष्ट जानकारी नही मिलती हैं इसलिए इस बीच को अंधकार युग के नाम से जाना जाता है ।

बाहरेन्द्र साय -

  • अंधकार युग के बाद बहरेन्द्रसाय कि जानकारी प्राप्त होती है।
  • इनका शासनकाल 1480 से 1544 ई. तक रहा।
  • बहरेन्द्रसाय ने अपनी राजधानी कोसगई को बनाया। कोसगई वर्तमान कोरबा जिले में है।
  • इन के शासनकाल में शत्रुओं की लूटपाट बहुत अधिक बढ़ गया इसीलिए समस्त राज कोसों को छुरिकोसगई क्षेत्र में ले गया और वही से शासन करने लगा अर्थात इन्ही कारणों से बाहरेन्द्र साय ने छुरी कोसगाई की निर्माण करवाया और कोषागार की स्थापना किया।
  • बाहरेन्द्र साय ने कोसगई मंदिर का निर्माण करवाया और चैतुरगढ़ का किला का निर्माण करवाया।
  • इन्होंने बिसई ठाकुर बिंझवार को सैन्य सहयोग के बदले जमीदारी स्थापित कर उन्हें सौप दिया


कल्याण साय -

  • बाहरेन्द्र साय के बाद सत्ता की बागडोर कल्याण साय के हाथों में आ गया।  कल्याणसाय का शासनकाल 1544 ई. से 1581 ई. तक रहा।  
  • गोपल्ला गीत के अनुसार कल्याण साय के समकालीन मुग़ल शासक जहांगीर ने इन्हे 8 वर्षों के लिए नजरबंद करवा दिया था। तुजुक -ए- जहाँगीरी के अनुसार जहाँगीर का पुत्र परवेज कल्याण साय को दिल्ली दरबार लेकर आया। गोपालराय नामक पहलवान ने कल्याणसाय को दिल्ली से मुक्त कराया। 
  • बाबुरेवाराम के अनुसार कल्याणसाय एवं मंडला के राजस्व अधिकारी के विववाद के परिणामस्वरूप कल्याणसाय को अकबर ने अपने दरबार में बुलाया और आठ वर्षों तक रखा। 
  • कल्याणसाय ने जमाबंदी प्रणाली एवं गढ़ व्यवस्था की शुरुआत की। 
  • कालांतर में ब्रिटिश अधिकारी मि. चिम्स ने प्रदेश को 36 गढ़ों में विभाजित किया।   

तखतसिंह -

  • तखतसिंह ने 1685 ई. से 1689 ई. तक शासन किया।   मुग़ल सम्राट औरंगजेब का समकालीन था। 
  • इन्होने अपने नाम पर तखतपुर नाम का एक शहर बसाया जो वर्तमान में बिलासपुर जिले में है।  
  • तखतसिंह के तीन भाई थे - सरदारसिंह , बखतसिंह और रघुनाथसिंह। 
  • राजसिंह -की राजसिंह ने 1689 से 1712 ई. तक शासन किया।  राजसिंह ने राजपुर नगर बसाया , यह रतनपुर के समीप है और बादल महल का निर्माण कराया। 
  • राजसिंह के दरबारी कवि गोपालमिश्र था जिनकी रचना - खूब तमाशा है। 

सरदार सिंह -

  • सरदारसिंह ने 1712 से 1732 ई. तक शासन किया। 
  • सरदार सिंह राज सिंह के चाचा थे जो उनके मृत्यु के बाद रतनपुर के सत्ता संभाले थे लेकिन उनके मृत्यु होने के बाद पुत्र न होने के कारण छोटे भाई रघुनाथ सिंह ने सत्ता की बागडोर संभाली। 

रघुनाथसिंह -

  • रघुनाथ सिंह ने 1732 से 1745 ई. तक शासन किया।  
  • 1741 ई. में भोसला शासक रघुजी प्रथम के सेनापति भास्कर पंत ने छत्तीसगढ़ में आक्रमण किया।  जिसमे युद्ध नहीं हुआ क्योकि रघुनाथ सिंह ने पुत्र न होने के कारण आत्मसमर्पण कर दिया और कलचुरी वश का अधिपत्य समाप्त हो गया।  
  • रघुनाथ सिंह कलचुरियों का अंतिम शासक और मराठों के अधीन प्रथम कलचुरी शासक था। 

मोहनसिंह -

  • मोहनसिंह ने 1745 ई. से 1757 ई. तक शासन किया 
  • मोहनसिंह मराठों के अधीन अंतिम कलचुरी शासक थे। 
  • मोहनसिंह ने ही कलचुरियों की समाप्ति का योजना बनाया और मराठों को युद्ध के लिए आमंत्रित किया।  



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