Bastar Ka Dashahara | बस्तर का दशहरा

Bastar Ka Dashahara | बस्तर का दशहरा

छत्तीसगढ़ में बस्तर का दशहरा शेष भारत से भिन्न है,बस्तर का दशहरा छग के बस्तर अंचल में मनाया जाता है,शेष भारत मे दशहरा रावण के वध के प्रति जबकि बस्तर का दशहरा दंतेश्वरी देवी के प्रति समर्पित है।
बस्तर का दशहरा श्रावण अमावस्या से लेकर अश्विन शुक्ल त्रयोदशी तक मनाया जाता है। बस्तर का दशहरा की शुरूआत काकतीय वंश के शासक पुरुषोत्तम देव द्वारा किया गया था।
यह पर्व 75 दिनों तक चलती है ।

पाटा जात्रा -

बस्तर दशहरा की प्रथम प्रथा है जिसमें लकड़ी की पूजा की जाती है जिससे रथ निर्माण की जाती है ।
लकड़ी लाने का दायित्व अगरवरा ,कचोरापाटी एवं राकेरा परगना के गांव के लोग करते हैं ।
रथ बनाने वाले बढ़ाई झार उमरगांव के होते हैं ।
रथ बनाने वाले लोहार बेड़ा उमरगांव के होते हैं ।
रथ खींचने वाली रस्सी करंजी ,सोना बाल एवं केशपाल ग्राम के निवासी बनाते हैं ।
बस्तर का दशहरा
BASTAR KA DASHAHARA

काछिन गादी-

इसका अर्थ काछिन देवी को गद्दी प्रदान करना होता है ।
काछिन देवी की गद्दी बेल बूटों के कांटों से बनी होती है ।
यह रश्म अश्विन अमावस्या के अवसर पर किया जाता है।इसमें का काछिन देवी की पूजा की जाती है ।
विशेष- राजा बस्तर दशहरा को निर्विघ्नं समाप्त होने की कामना व आशीर्वाद महरा समुदाय की इष्ट देवी काछिन माता से का गुड़ी तक लेते हैं, इस गुड़ी में उसी दिन 9 वर्ष तक की मिरगान कुंवारी कन्या के ऊपर आते हैं ।

इसे भी पढ़िए:छग का इतिहास

जोगी बिठाना-

 हलबा समुदाय के एक कोई सदस्य दसारा को निर्विघ्न संपन्न करने के लिए 9 दिन तक व्रत रखकर योग साधना में बैठता है जिसे जोगी बिठाई कहते हैं।
सामान्यतः आमाबाल एवं पराली गांव के निश्चित घरों से हल्बा जाति के लोग यहां परंपरागत रूप से बढ़ते हैं।
यह रश्म सीरासार, जगदलपुर में होता है।
इसमें प्रमुख रचना कलश स्थापना है। 
इसमें 7 मांगुर मछली अर्पण की प्रथा है।

रथ परिक्रमा- 

इसमे मुंडा जनजाति द्वारा मार लोक नृत्य किया जाता है
मां दंतेश्वरी के छत्र को रथ पर विराजित कर नगर भ्रमण कराया जाता है इसके पश्चात दुर्गा अष्टमी को निशा यात्रा कार्यक्रम आयोजित होता है बस्तर दशहरे में चार पहिए के रात को कचोरापाटी एवं अगरवरा परगने के लोग तथा 8 पहिए वाली रैनी रथ को किलेपाल के माडिया खींचते हैं।

 जोगी उठाना -

इसमें 9 दिन पूर्व से बैठे जोगी को भेंट प्रदान कर योग साधना से उठाया जाता है ।

मालवी परघाव-

इसमें मालवी देवी का स्वागत करते हैं ,बस्तर के कादिया पूर्व ईष्ट देवी मालवी माता (दंतेश्वरी माई की बड़ी बहन )को पालकी में बिठाकर दंतेवाड़ा से बस्तर लाया जाता है। चार माड़िया जाति के व्यक्तियों द्वारा कंधे से उठा कर लाया जाता है।

भीतर रैनी-

यह विजयादशमी के दिन किया जाता है ,विजयादशमी के दिन आठ पहिये वाला पूर्ववर्ती रथ को नगर भ्रमण कराया जाता है ।
रथ परिक्रमा पूर्ण होने के उपरांत इस रथ को प्रथा अनुसार कुमढ़ाकोट ले जाते हैं।
नागरिकों को रुमाल व बीड़ा पान देकर सम्मानित किया जाता है ।

बाहिर रैनी -

अश्विन शुक्ला एकादशी के दिन किया जाता है ,इस दिन का कुमढ़ाकोटा में राजा देवी को नया अन्न अर्पित कर प्रसाद ग्रहण करते हैं ।
इस कार्यक्रम में धनुकाड्या की धुम होती है ।
भतरा जनजाति के लोग धनुकाड्या बनते हैं ।
बाहिर रैनी का झुलेदार रथ कुमढ़ाकोट से सिंह द्वार की ओर अग्रसर होती है।

मुरिया दरबार -

अश्विन शुक्ल द्वादशी के दिन होता है इस दिन सिरहसार जगदलपुर में राजा दरबार का आयोजन कराते हैं।
इस सभा में ग्रामवासियों की सामान्य समस्याओं पर चर्चा कर निराकरण किया जाता है।

ओहाड़ी-

 यह विदाई रश्म है अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को किया जाता है। इस रश्म में मावली माता के विदाई सम्मान में गंगा मुड़ा यात्रा संपन्न होती है। दंतेवाड़ा से लाई गई मावली माता को विदा किया जाता है।

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