छत्तीसगढ़ का इतिहास/प्रागैतिहासिक काल

*छत्तीसगढ़ का इतिहास भारत के इतिहास से प्रभावित रहा है जो मानव सभ्यता के प्रारंभिक विकास से लेकर आधुनिक काल तक के लंबे इतिहास का साक्षी रहा है .

*लिपि के विकास के आधार पर प्रदेश के इतिहास को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है -
1.प्रागैतिहासिक काल
2.आद्य ऐतिहासिक काल
3.ऐतिहासिक काल

*प्रागैतिहासिक काल को चार भागों  में वर्गीकृत किया गया है-
1 पूर्व पाषाण काल
2 मध्य पाषाण काल
3 उत्तर पाषाण काल
4 नवपाषाण काल

1.पूर्व पाषाण काल(पूरा पाषाण काल)-
रायगढ़ जिले के सिंघनपुर की गुफा और महानदी घाटी  पाषाण कालीन शैल चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
विशेष- पत्थर कुदार मिले हैं

2. मध्य पाषाण काल-
 रायगढ़ जिले के कबरा पहाड़ की गुफा से लाल रंग के छिपकली' घड़ियाल 'कुल्हाड़ी' सांभर आदि के चित्रकारी अवशेष मिले है।
 इसके अलावा मध्य पाषाण काल के महत्वपूर्ण साक्ष्य लंबे फलक वाले औजार, अर्धचंद्राकार लघु पाषाण औजार आदि है।

3. उत्तर पाषाण काल-
 उत्तर पाषाण काल के लिए बिलासपुर जिले का धनपुर रायगढ़ जिले का महानदी घाटी प्रसिद्ध है ।
 यहां से मानव आकृतियों का चित्रण एवं औजारों की आकृति खुदी हुई है ।

4.नवपाषाण काल-
 रायगढ़ जिले के टेरम, दुर्ग जिले के अर्जुनी और राजनांदगांव जिले के चितवा डोंगरी इसके लिए प्रसिद्ध है।
 विशेष -  छिद्रित धन औजार प्राप्त हुए है।

अन्य तथ्य-
1.पाषाण घेरे
बालोद (करहिभदर,चिरचारी,सोरर)- शव को दफना कर बड़े पत्थरों से ढक दिया जाता था।
कोंडागांव(गढ़धनोरा)- मध्य पाषाण युगीन 500 स्मारक प्राप्त हुए हैं ।
इसकी खोज रमेन्द्र नाथ मिश्र व कामले ने किया है।

2.शैल चित्र-
-कबरापहाड़ (रायगढ़)-सर्वाधिक शैल चित्र
-सिंघनपुर की गुफा(रायगढ़)- मानवाकृतियाँ,सीढ़ीनुमा और बासनुमा आखेट करता हुआ मनुष्य का शैल चित्र है।

3.लोहे का साक्ष्य -
-सरगुजा(जोगीमारा,सीताबेंगरा)
-करहिभदर,चिरचारी,सोरर,करकाभाठा(बालोद)-लोहे के औजार व मृदभांड प्राप्त हुआ है।

*अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
- प्रागैतिहासिक सबसे प्राचीन गुफा सिंघनपुर की गुफा फिर कबरा पहाड़ की गुफा।
- सर्वाधिक शैल चित्र कबरापहाड़ की गुफा।
-  सर्वाधिक जानकारी कबरा पहाड़ की गुफा।
-  सबसे लंबी गुफा बोतल्दा की गुफा ।
-  इस काल के सर्वाधिक शैलचित्र रायगढ़ जिले से मिले हैं
-  नवपाषाणिक अवशेषों की सर्वप्रथम जानकारी डॉक्टर रविंद्र नाथ मिश्रा डॉक्टर भगवान सिंह ने दिया।
-  छत्तीसगढ़ के शैल चित्रों की खोज सर्वप्रथम 1910 में अंग्रेज इतिहासकार एंडरसन ने किया था।

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